क्यों भगवान विष्णु को वामन अवतार लेकर बलि का द्वारपाल बनना पड़ा, जानें कथा

क्यों भगवान विष्णु को वामन अवतार लेकर बलि का द्वारपाल बनना पड़ा, जानें कथा
WhatsApp Image 2021-01-08 at 15.08.21
WhatsApp Image 2021-01-17 at 13.22.37
tall copy
WhatsApp Image 2021-01-26 at 12.25.37
Untitled-1

धर्म

वामन अवतार भगवान विष्णु का ही एक अवतार माना जाता है। भगवान विष्णु ने यह अवतार लेकर राजा बलि को पताल लोक का राजा बनाया था। जिसके द्वारपाल वह स्वंय बने थे आखिर क्यों भगवान विष्णु को ऐसा करना पड़ा, आइए जानते हैं राजा बलि और भगवान विष्णु की कथा।
महाराज बलि का जन्म विरोचन की पत्नी सुरोचना के गर्भ से हुआ था। विरोचन के पश्चात बली दैत्यों के अधिपति हुए। देवासुर संग्राम में इन्द्र के वज्र द्वारा इनकी मृत्यु हो गई थी। दैत्यगुरू शुक्राचार्य ने अपनी संजीवनी विद्या द्वारा इन्हें नव जीवन प्रदान किया और इनके द्वारा विभाजित यज्ञ का अनुष्ठान करवाया। उस यज्ञ में अग्निदेव ने स्वयं प्रकट होकर बलि को दिव्य रथ के साथ धनुष, बाणों भरा तरकश एवं अभेद्य कवच प्रदान किया। उस रथ पर सवार होकर बलि देवताओं को हरा कर स्वर्ग के अधिपति हो गए। उन्हें नियमित इन्द्र बनाने के लिए दैत्यगुरू शुक्राचार्य उसने सौवाँ अश्वमेधयज्ञ करा रहे थे।
उधर, अपने पुत्रों का निर्वासित जीवन व्यतीत करते हुए देखकर देवमाता अदिति को अत्यन्त कष्ट हुआ। उन्होंने अपने पति महर्षि कश्यप की सलाह से पयोव्रत के द्वारा भगवान की आराधना की। उनकी अराधना से प्रसन्न होकर भगवान ने उनके गर्भ से अवतार लेकर देवताओें का दु:ख दूर करने का अश्वासन दिया।
समय आने पर वामन रूप में अदिति के यहाँ भगवान का जन्म हुआ। महर्षि कश्यप ने ऋषियों के द्वारा उनका यज्ञोपित संस्कार करवाया। वहा से भगवान वामन बलि की यज्ञ शालाकी ओर चले। उनके तेज से प्रभावित होकर महाराज बलि के सभी ऋत्विज उनके स्वागत में खड़े हो गये। महाराज बलि ने सिंहासन पर बैठाकर भगवान वामन का पद प्रक्षालन किया और चरणोदक लिया। बलि ने कहा- भगवन आपके आगमन से में आज मैं कृतार्थ हो गया और मेरा कुल धन्य हो गया। आप जो भी चाहें, मुझसे नि:संकोच माँग लें।
भगवान वामन ने बलि के कुल एवं दानशीलता की प्रशंसा करते हुए उनमें मात्र तीन पद की भुमि की याचना की। बलि के बार बार और माँगने के आग्रह के बाद भी उन्होंने कुछ भी माँगना स्वीकार नही किया। बलि जब भूमि दान संकल्प देने चले, तब दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने उन्हें स्मझाते हुए कहा- ये वामन रूप में साक्षात भगवान विष्णु हैं। तीन पद के बहाने तुम्हारा सर्वस्य ले लेंगे इसपर बलि बोले- गुरूदेव सम्पूर्ण यज्ञ तो भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए होते हैं। यदि वो स्वयं दान लेने के लिए मेरे यज्ञ में उपस्थित हैं तो यह परम सौभाग्य और प्रसन्नता का विषय है। ब्राम्हाण को दान देने का वचन देकर कदापि नही फिर सकता इसपर शुक्राचार्य उन्हें श्रीभ्रष्ट का शाप दे दिया।
आचार्य ने शाप से भयभीत हुए बिना बलि ने भगवान को भूमि का दान देने का संकल्प लिया।इसके बाद भगवान वामन से विराट हो गये। उन्होंने एक पद में पृथ्वी और दूसरे में स्वर्ग लोक को नाप लिया। तीसरे पद के लिए बलि को वरूण पाश में बाध लिया। बलि ने नम्रता से कहा प्रभो, सम्पति का स्वामी सम्पति से बड़ा होता है। आपने दो पद में मेरा राज्य ले लिया। शेष एक पद में मेरा शऱीर नाप लें, तीसरा पद आप मेरे मस्तक पर स्थापित करें।
इस तरह महाराज बलि ने अपनी भक्ति से अपने अपूर्व त्याग से भगवान को बाँध लिया। भक्ति के वश में होकर भगवान ने वरदान मांगने को कहा। इस पर बलि ने उन्हें अपना द्वारपाल बनने का आग्रह किया। इस तरह पाताल में भगवान विष्णु को बलि का द्वारपाल बनना पड़ा।

 82 total views,  1 views today

shyam ji

shyam ji

Leave a Reply