हिन्दी की पुकार पर, सात समंदर पार तक मची हलचल !

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पटना

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने आयोजित किया अंतर्राष्ट्रीय वेब कवि-सम्मेलन

बिहार की गौरवशाली राजधानी पाटलिपुत्र की पावन धरती से उठी हिन्दी की पुकार पर सात समंदर पार तक हलचल मची और राष्ट्रभाषा प्रेम तथा देश भक्ति की ऊँची-ऊँची लहरें आसमान छूने लग पड़ीं। गीत ग़ज़लों ने भारत के मन-प्राण को शब्द दिए तो सांस्कृतिक-चेतना के दिव्य भाव उमड़ने-घुमड़ने लगे। बेंकूवर अमेरिका से वरिष्ठ कवयित्री प्राची चतुर्वेदी रंधावा ने जब ये पंक्तियाँ पढ़ीं कि “है गर्व कि भारत की बेटी हूँ, विश्व विजय का जज़्बा है/ न शिकन है माथे पर न डर कोई/ हर धड़कन में भारत बसता है” तो देश और हिन्दी-प्रेम की अविरल धार बहने लगी।इन्हें सुनकर संसार भर से जुड़े हज़ारों हृदय ही स्पंदित नहीं हुए, बल्कि हज़ारों हाथ भी जुड़े और उल्लास का नाद अनुगूँजित होने लगा। अवसर था, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन (भारत), सृजनी ( अमेरिका) तथा कलाकक्ष, पटना के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कवि-सम्मेलन का, जिसका नाम ‘७ समंदर पार से, हिन्दी की पुकार पर’ दिया गया था। सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ की अध्यक्षता में, ‘स्ट्रीम यार्ड’ के माध्यम से, गत शुक्रवार (१९ फरवरी) की मध्य रात्रि में संपन्न हुए इस वेब काव्य-सम्मेलन में अमेरिका से वरिष्ठ कवयित्री नीलू गुप्ता विद्यालंकार, लंदन से कवि आशुतोष कुमार, जर्मनी से कवयित्री डा शिप्रा शिल्पी सक्सेना, कनाडा से कवयित्री प्राची चतुर्वेदी रंधावा, मास्को (रूस) से श्वेता सिंह ‘उमा’, अमेरिका से अर्चना पांडा , क़तर से कवयित्री मोनी विजय, आबूधाबी से कवयित्री ललिता मिश्र, अयोवा अमेरिका से चर्चित कवयित्री डा श्वेता सिन्हा, भारत से वरिष्ठ कवि मृत्युंजय मिश्र करुणेश, वरिष्ठ शायर आरपी घायल, कवयित्री आराधना प्रसाद, डा पल्लवी विश्वास ने अपने काव्य-पाठ से, पूरी दुनिया से जुड़े हज़ारों काव्य-रसिकों को आह-आह और वाह-वाह करने पर विवश कर दिया। भारतीय समय के अनुसार संध्या ८ बजे से आरंभ हुए इस भव्य कवि-सम्मेलन में रात्रि साढ़े ११ बजे तक रस-गंगा बहती रही, जिसमें श्रोता आनंद के गोते लगाते रहे।
अमेरिका से डा श्वेता सिन्हा तथा भारत से डा पल्लवी विश्वास के संयुक्त रूप से हुए सुंदर और हृदय-ग्राही संचालन में ‘हिन्दी की पुकार पे सात समंदर पार से’ जुड़े सभी कवियों और कवयित्रियों ने ख़ूब मन से पढ़ा और पूरे मन से उन्हें पूरी दुनिया में सुना गया। इस कार्यक्रम का सीधा-प्रसारण फ़ेसबुक लाइव से भी किया जा रहा था।
कवि-सम्मेलन का आरंभ मास्को से श्वेता सिंह ‘उमा’ ने वाणी-वंदना से किया। उन्होंने अपनी रुबाइयों से श्रोताओं का दिल जीत लिया। उनकी इन पंक्तियों पर कि “तन्हाई में मुझे तनहा रहने भी नहीं देते हो/ ज़ुबाँ तक जो बात आए, ज़ुबाँ से कहने नहीं देते/ चुपके से आते हो, ज़ख्मों पे मरहम लगाते हो/ दर्द भी देते हो और दर्द को सहने भी नहीं देते हो।”, देर तक वाह-वाह का स्वर गूँजता रहा। कवयित्री आराधना प्रसाद ने तरन्नुम से यह ग़ज़ल पढ़ी कि “ख़िज़ाँ ही आई न आई बहार मुद्दत से/ तड़प रहा है दिल-ए-बेक़रार मुद्दत से/ न रोको तेज़ हवा से इसे भड़कने दो/ दबा है राख के नीचे शरार मुद्दत से”।
लंदन से अपनी ग़ज़ल पढ़ते हुए वरिष्ठ कवि आशुतोष कुमार ने जीवन और समय को दार्शनिक दृष्टि से देखा और ख़ास तौर से ये पंक्तियाँ पढ़ी कि “वक्त के पन्ने पे तारीख़ नई आती है/ ज़ीस्त के माथे पे सिलवट बढ़ती जाती है/ जानता हूँ अब ये साल नया है लेकिन/ जो गया है उसके ग़म की सदा आती है।”
अबुधाबी से कवयित्री ललिता मिश्रा ने अपनी रचना में बचपन के सुहाने दिनों को याद करते हुए कहा कि “चलो ले चलूँ मैं बचपन की गली/ सपनों सी लगती है सुंदर रुपहली/ बचपन में था मेरा गाँव रंगीला/ उसमें थे मेरे दद्दू सलोने/ घुमाते थे मुझको कंधों पर बिठाकर/ खिलाते थे मुझको झूला झूला कर/ लोरी थी उसमें परियाँ थी उसमें/ आल्हा और ऊदल के क़िस्से थे उसमें”। वहीं क़तर से जुड़ी कवयित्री मोनी विजय ने तरल नयनों से बाबुल को याद किया और ये पंक्तियाँ पढ़ी कि “बाबुल मोरा काहे बिसरत नाहीं तोरा याद/ खोजूँ वो किवड़ियाँ, खोजूँ वो दुआर/ काहे नहीं आँगन मोरे, मैया की रसोई / काहे नाहीं बाबा के दुलार?”
भारत से वरिष्ठ कवि मृत्यंजय मिश्र ‘करुणेश’ ने अपनी ताज़ा ग़ज़ल को पढ़ते हुए कहा “खिला हो फूल ख़ुशबू का बिखर जाना ज़रूरी है/ मिला हो रूप तो उसका सँवर जाना ज़रूरी है/ भले तुम आसमां से भी बहुत ऊपर चले जाओ/ है रहना तो ज़मीं पर ही उतर जाना ज़रूरी है”। तो आर.पी. घायल ने कहा- “किसी से इश्क़ का मतलब इबादत है इसी से मैं/ इसी में डूबकर गहरा समंदर लांघ जाता हूँ/ ग़ज़ल के फूल खिलते हैं गुलाबों की तरह मुझमें/ उन्हीं फूलों की ख़ुशबू में मैं ज़माने को लुटाता हूँ”।
वरिष्ठ हिन्दी-सेवी और आयोजन की मुख्य अतिथि नीलू गुप्ता विद्यालंकार ने अतिथियों का स्वागत करते हुए, इस कवि-सम्मेलन को पूरी दुनिया के हिन्दी-प्रेमियों के बीच नवीन ऊर्जा भरने वाला ऐतिहासिक महोत्सव बताया तथा कहा कि इसकी अनुगूँज से अवश्य ही सारा-संसार स्पंदित होगा।
अपने अध्यक्षीय काव्य-पाठ में सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने इन पंक्तियों को स्वर दिया कि “तड़प है कि तलब है कि ज़िद है बाक़ी/यह दिल भी धड़कता है कि उम्मीद है बाक़ी/ वो जब से गए हैं दूर देकर दीद हमें/ तब से इन आँखों में कहाँ नींद है बाक़ी।” उनकी इन पंक्तियों को भी बहुत पसंद किया गया कि “उठ गए हैं वो लोग जो रहे कभी ज़िंदा/ इस शहर में अब लाश और गिद्ध है बाक़ी। मुहब्बत भी जताने के खाह राह बहुत हैं/ होली है दिवाली है, ईद है बाक़ी।”
डा सुलभ ने अपने अध्यक्षीय उद्गार में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के गौरवशाली १०० वर्षों के इतिहास पर एक विहग-दृष्टि डाली और कहा कि यह अत्यंत अनुकूल समय है जब संसार भर में बिखरे समस्त भारतवासी, हिन्दी का गौरवशाली ध्वज अपने हाथों में लें तथा उसे चतुर्दिक लहराएँ। वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी विश्व की सबसे बड़ी और सबकी प्रिय भाषा होगी। उन्होंने सभी प्रवासी नागरिकों से, विशेषकर हिन्दी-सेवियों से आग्रह किया कि प्रवास के अपने-अपने देश में वे ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ की स्थापना करें और इस भाषा को संसार के गाँव-नगर तक पहुँचाएँ।
तीनों ही आयोजक संस्थाओं की ओर से धन्यवाद ज्ञापन कलाकक्ष के महासचिव अविनय काशीनाथ ने किया। इसके पूर्व उन्होंने महाकवि काशीनाथ पाण्डेय रचित गीत ‘अब न पाखी बोलेगा तो जिया नहीं जाएगा/ मौन फट जाएगा तो सिया नहीं जाएगा’ का गान कर श्रोताओं का दिल जीत लिया

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shyam ji

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